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भारतीय सिनेमा कल्चर

INDIA CINEMA CULTURE- भारतीय सिनेमा कल्चर 


हेलो दोस्तों, भारत में  एशिया की सबसे बड़ी फिल्म उद्योग है।  वहाँ न सिर्फ अभिनेता निर्देशक बल्कि हज़ारो  स्पॉट बॉय , लाइट बॉय  को भी काम मिलता है।    भारतीय सिनेमा दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्मे बनाने के लिए  भी जाना जाता है।  यहाँ तेलुगु , हिंदी , तमिल , भोजपुरी और अन्य भाषाओ में फिल्मे बनती है।  2016 में हुए सर्वे  भारत के अनुसार  लगभग 3000 फिल्मे बानी , जिसमे  1000 शार्ट फिल्मे और 2000 फीचर फिल्म बनी थी।

हाल ही 1991 में हुए आर्थिक सुधार में विदेशी निवेश की अनुमति  के बाद  अंतर्राष्ट्रीय मीडिया जैसे 20 TH CENTURY FOX, WARNER BROS इत्यादि ने भी भारतीय  सिनेमा  निवेश करना शुरू कर दिया है।  जिससे बहार के निर्माता निर्देशक ने यहाँ सामाजिक-सांस्कृतिक विषयो पर फिल्मे   बना रहे है।
 आप और हम आज के दौर के फिल्मो के बारे में सब जानते है,अब  फ़िल्मी जगत पूरी तरह से आधुनिक बन चूका है।  पर हमारा  भारतीय फिल्म जगत का सफर आपको नहीं पता होगा , इसमें कई दौर आये और कई दौर चले भी गए।  तो आइये अपने प्यारे सिनेमा के लम्बे सफर पर चलते है।


 INDIA CINEMA CULTURE -मूक फिल्मो का दौर (SILENT FILMS)

जैसे कोई बच्चा पैदा होते ही कुछ नहीं बोल पता था वैसे ही हमारा फिल्म उद्योग भी था।  यहाँ शुरू में बनने वाली फिल्मे साइलेंट थी।  ये साइलेंट फिल्म पूरी तरह से गूंगी नहीं थी , इनमे संगीत और डांस दोनों थे बस डाइलोगे नहीं बोले जाते थे।  1910 के दसक की ये  फिल्मो जब  परदे पर दिखाया जाता  संगीत यंत्र जैसे संरंगी , तबला , हारमोनियम और  इत्यादि के साथ लाइव संगीत बजाय जाता था। 1912 में   पहली भारतीय-अँगरेज़ सहयोग से पुंडलिक फिल्म बानी जिसे  न.ग.चित्रे  और र.ग.टोर्नेय ने बनाया था .  
 दादा साहेब फाल्के ने 1913 में  पूरी तरह देसी राजा हरिश्चंद फिल्म बनाया था।  उनको फादर ऑफ़ इंडियन सिनेमा भी कहा जाता है।  उन्होंने मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री जैसे फिल्मे बनायीं  पहली हिट फिल्म लंका दहन 1917 में बनाया था। 
1918 तक दो फिल्म कंपनी कोहिनूर फिल्म कंपनी और दादा साहेब फाल्के हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म कंपनी खुल चुकी थी। उस समय तक फिल्मे अच्छा मुनाफा करना शुरू कर दिया था तब अंग्रेज़ो ने फिल्मो पर   "एंटरटेनमेंट टैक्स"  शुरू किया पर फिल्मी जगत पर कुछ असर नहीं  हुआ। 
सिनेमा की शुरुवाती दिनों में फिल्मो की अधिकतर विषय पौराणिक और इतिहास हुआ करता था क्योकि ये लोग सिनेमा से अधिक बांध कर रखता था।  
कुछ लेखक और निर्देशक जैसे व्.शांतरम ने सामाजिक मुद्दो परअमर ज्योति  जैसी  फिल्मे बनायीं जिसमे समाज में औरतो की स्तिथि  गया।  पहली महिला फिल्म निर्माता फातिमा बेगम ने 1926 में अपनी बुलबुल-ए-परस्तान बनायीं थी। 
उस दौर में कई अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से फिल्मे बानी जिनमे से कुछ लोकप्रिय नल दयामती , प्रेम सन्यास , अ थ्रो ऑफ़ डाइस जैसे फिल्मे थी।

 INDIA CINEMA CULTURE - टाल्कीस का दौर (TALKIES)

TALKIES इसलिए कहा  क्योकि इस समय तक फिल्मो डाइलोगे का चलन शुरू होगा गया था। आलम आरा पहली टाल्कीस फिल्म थी। इसमें कुछ यादगार गाने थे जिसे बनाया था व.म.खान ने, जो भारत के पहले गायक गाना  दे दे खुदा के नाम पर जो की भारत का पहला रिकार्डेड गाना  था।  
यही वो दौर था जिसने मूक फिल्मो को ख़तम कर दिया , पर इसी के साथ साथ फिल्मे बनाने में कई टेक्निकल प्रॉब्लम सामने आयी जैसे डाइलोगे लिखने के लिए लेखक   न मिलना , अच्छे गाना न लिख पाना , यहाँ तक की गाना भी ऑन दा स्पॉट गए जाते थे।  1930 आते आते फिल्मो बनाना चुनौतीपूर्ण बन गया था।  
तब नए निर्माता कंपनी जैसे बॉम्बे टाल्कीस, न्यू थिएटर और प्रभात सामने आये जिन्होंने स्टूडियो सिस्टम अपनाया। 1935 में प.स.बरुआ की देवदास स्टूडियो में बनाने वाली पहली पिक्चर बानी थी। अब स्टूडियो सिस्टम  से निर्माताओं ने फिल्मो में प्रयोग करना  शुरू  किया।  
प्रयोग में  1933में   पहली सफल रंगीन फिल्म सैरंध्री बानी , जिसे जर्मनी से प्रोसेस किया गया था। पर  1937 में  पूरी तरह से देसी हंटरवाली,तूफ़ान मेल  फिल्म बानी थी।

 INDIA CINEMA CULTURE-1940 युद्ध का दौर 

चालीस के दशक को भारतीय राजनीती ने बर्बाद कर दिया जिसका  सीधा रिफ्लेक्शन फिल्म जगत में भी दिखाई दिया।  आजादी के लिए जोश धरती के लाल,दो ऑंखें बारह हाथ जैसे फिल्मो  में दिखाई दिया।  कई फिल्मे ऐसी आयी जो दुखद प्रेम कहानियो को दर्शाया जैसे चंद्रलेखा, लैला मजनू , सिकंदर चित्रलेखा   शामिल है।  
इस दसक से सामाजिक परिस्तिथि को दिखने का भी दौर चला नीचे नगर,औरत, पुकार फिल्मो ने मेहबूब,चेतन आनंद को सफल  फ़िल्मकार बनाने में मदद की थी।  इसी दसक में 1948 में RK फिल्म्स इस्तापित हुआ था ,इस प्रोडक्शन हाउस से पहली फिल्म आग का निर्माण हुआ था।  


INDIA CINEMA CULTURE-1950 जवानी का दौर  

इस दौर में फिल्मो में यौवन के प्रदर्शन का प्रचलित हुआ।  इसी कारण  CENTRAL BOARD OF FILM CERTIFICATION की स्तापना की गयी। फिल्म बनाने का विषय इतना बढ़ चूका था इस दौर में की भारतीय सिनेमा दो हिस्सों में बाट  गया।  पहला हमारा बॉलीवुड और दूसरा साउथ की फिल्मो टॉलीवूड। इसी दौर में 'फिल्मी सितारों' उदय हुआ था।  त्रिमूर्ति कहे जाने वाले - दिलीप कुमार,देव आनंद, और राज कपूर ने   फ़िल्मी जगत में सर्वोच्च मुकाम हासिल किया।  1953 में पहली बार  टेक्नि-कलर का इस्तमाल करके सौरभ मोदी द्वारा झाँसी की रानी बनाया गया।  
INTERNATIONAL FILM FESTIVAL OF INDIA AWARD (iFFa) का सुबह आरम्भ 1952 को बॉम्बे से हुआ , जिसने भारतीय फिल्मो की लिए विदेश बाज़ारो का रास्ता खोल दिया था।  दो बीघा ज़मीन को CANNES फिल्म उत्सव में अंतर्राष्ट्रीय पेहचान मिली और उसे  अवार्ड से नवाज़ा गया। 1957 में  मदर इंडिया को बेस्ट फॉरेन  भाषा सूचि में  ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया था।  फिल्मो को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद भारत सरकार ने राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कार का आयोजन करना शुरू कर दिया।  श्यामची आई राष्ट्रीय पुरुस्कार जितने वाली पहली फिल्म बनी थी।

 INDIA CINEMA CULTURE - 1960 स्वर्ण युग 

अब तक संगीत जगत का भी काफी बोलबाला बढ़ चूका था।संगीत में नयापन आ चूका था।  अब  कई फिल्मे संगीत को  अपना हथियार बना चुकी थी। संगीत के ज़रिये फिल्मे और भी चलने लगी थी।  इनमे कुछ नामचीन फिल्म है जिस देश में गंगा बहती है , गाइड वक़्त इत्यादि। इस दशक  ने दो युद्ध भी देखे 1962 और 1965  की लड़ाई जिससे राष्ट्रवाद पर फिल्मे बनाने की प्रेरणा मिली, हक़ीक़त,आराधना,संगम जैसे कुछ मशहूर राष्ट्रवाद फिल्मे है।  
सिनेमा अब भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी , वही दूसरी और फिल्मो की गुड़वत्ता बढ़ाने की ज़रूरत आ चुकी थी। 1960 में  इस ज़रुरत को पूरा करने के लिए भारतीय फिल्म और टेलीविज़न संसथान की इस्थापना पुणे में की गयी।  जहा नए कलाकार निर्देशक ट्रेनिंग कर सकते थे।  वर्ष 1969 में दुखद रूप से दादा सहन फाल्के जी का निधन हो गया , जिसके सम्मान में फ़िल्मी जगत का सर्वोच्च पुरुस्कार दादा साहेब फाल्के पुरस्कार रखा गया।  


INDIA CINEMA CULTURE - 1970-80 एंग्री यंग मैन 


इस दौर में गुस्से से भरे नौजवान की कहानी देखना लोग को बहुत भा  रहा था। इस दौर में निर्माताओ को हिट फिल्मे बनाने का फार्मूला मिल गया था ,अधिकतर फिल्मो में नवजवान जो बम्बई सहर नौकरी की तलाश में आता था आमिर और गरीब में फस जाता था। लोग को अमीरो की ज़िन्दगी में अपने खुद के सपने दिखने लगे।  इस दौर के पोस्टर बॉय श्री अमिताभ बचन जी बने , उनकी ज़ंज़ीर,अग्निपथ,अमर अकबर अन्थोनी को लोगो द्वारा खूब पसंद किया गया। 
कुछ अलग शैली की फिल्मो ने भी इस दौर में अपना जगह बनाया। इन मे डरावनी कहानिया जैसे दो गज ज़मीन के निचे लोगो को खूब पसंद आयी थी।  बी ग्रेड फिल्मो ने अलग केटेगरी बनाया गया जिसमे डरावनी और कामुक फिल्मो को बनाया जाने लगा।  इसके साथ साथ ही धर्मीक  फिल्मो ने भी अपनी अलग छाप   छोड़ी  जैसे जय संतोषी माँ को लोगो द्वारा पसंद किया गया।  
लाइन से अलग हट कर एक सदाबहार फिल्म शोले 70 MM रील पर बनाने वाली पहली फिल्म थी।  इसने उस समय के सरे रिकॉर्ड तोड़ डाली और सिनेमा के इतिहास में सबसे ज्यादा लम्बी चलने वाली फिल्म बनी।

 INDIA CINEMA CULTURE - 1980-2000 प्रेम-प्रासंगिक का दौर 

80 के दसक के बाद सिनेमा जगत का चेहरा बहुत तेज़ी से बदला।  सामाजिक मुद्दे , रोमांटिक , पारिवारिक नाटक जैसे शैली पर बनाने वाली फिल्मो भरपूर दर्शक मिलने लगे। इस समय का मुख्य चेहरा अनिल कपूर,जैकी श्रॉफ  और गोविंदा बन चुके थे।  इनकी बहुत सफल हिट फिल्मो में शामिल है तेज़्ज़ाब, राम लखन , फूल और कांटे, हम जैसे फिल्मे।  80 के दसक के आखरी आते आते नैतिक वाले गुंडों का प्रचलन हुआ जिसमे शारुख खान को बॉलीवुड की उच्चाईयो तक पहुचा दिया उनकी कुछ जबजस्त लोकप्रिय फिल्मे थी बाज़ीगर और डर।  

1991 के आर्थिक सुधार के बाद लोगो की पहुंच  ज्यादा फिल्मो और टीवी तक  बन गयी।  लोगो के पास ज्यादा पैसा आने लगा जिसे लोगो ने अमीर शहरी नवजवान को देखना ज्यादा पसंद किया गया।  आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे , दिल तो पागल जैसे फिल्मो उनकी पसंद को पूरा किया। इस दौर ने बॉलीवुड की दूसरी त्रिमूर्ति को देखा - सलमान खान, शाहरुख़ खान, और आमिर खान।  
वैश्वीकरण के बाद नयी नयी तकनीकों से फिल्मो बनाने लगी ,मलयालम  माय डिअर कुट्टिचेतन भारत की पहली 3D फिल्म थी,इसे छोटा चेतन के नाम से हिंदी ने डबिंग की गयी।  साथ साथ 1942-लव स्टोरी में पहली बार डॉल्बी साउंड सिस्टम का उपयोग किया गया।

 INDIA CINEMA CULTURE - 2000 के बाद 

सन 2000 के बाद नए सिनेमा का जन्म हुआ है।  सताब्दी के सुरुवात के बाद समनांतर सिनेमा को काफी सराहा और पसंद किया गया है। इस समान्तर सिनेमा का सिर्फ यही मकसद रहा है की अच्छी फिल्मे बनाना और फिल्मो के साथ प्रयोग करते रहना है।  इस तरह के फिल्मे   भले ही कमाई के मामले में कमज़ोर रहती है समाज का आईना बन कर समाज से   रूबरू कराती है। 
 यह  सिनेमा इन  मकसद से बनाई पहला नए सत्यवाद से  लोगो को रूबरू करना जैसे सामाजिक त्रुटि दिखाना , औरत पर अत्याचार इत्यादि।  दूसरा लोगो को फिल्मो के माध्यम से शिक्षा देना और तीसरा विश्व स्तर में कलाकार और निर्माता की मेहनत  को दिखाना होता।  इस समान्तर सिनेमा की सूचि में ब्लैक ,गुजारिश ,  जैसे मशहूर फिल्मे है।  


आसा है आप सभी को फिल्मो के सफर में अच्छा लगा होगा । अगर पोस्ट पसंद आया हो तो कमेंट बॉक्स में मुझे जरूर बताये। और शेयर करे और इसमें  गलती दिखी तो उसे भी बताये मै  उसे सुधरे की कोसिस करूंगा। 
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